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Monday, 11 December 2017

कल रात

कल रात कुछ लम्हो की कहा सुनी हुई है शायद,
सहर के लम्हो के माथे पर हैरानी के घाव लगे थे,
हर लम्हे की चाल भी धीमी और थकी सी लगती थी,
ज़ख्मो से बेज़ार, शरमिंदा, आँखों में आंसू लेकर,
जाने क्या उम्मीद लिए सब मेरी ज़ानिब देखते थे,
कौन ग़लत था, कौन सही था,
क्या सबब था, क्या नहीं था,
खुदा ही जाने या फिर उन हालात को मालूम,
जो एकलौता गवाह है कल रात के सारे किस्सो का,
गुज़र चुके वो सब लम्हे, जख्मी थे पर ज़िंदा थे,
इतने साफ़ नज़र आते थे, जैसे अभी इस दौर के हो,
कुछ देर रुके, फिर लिपट कर मुझसे,
फूट फूट के रोने लगे, जैसे लड़कर आपस में,
बच्चे रोने लगते है,
वक़्त ने अपने हाथों से फिर सबके आंसू साफ़ किये,
सभी गलतियां, सारे गुनाह कुछ न कहे ही माफ़ किये,
अक्सर यही होता है कि,
लम्हो के छोटे झग़डे, नोक झोंक और बहासबाजिया,
वक़्त, बिना कुछ कहे सुने ही, यु सुलझाता आया है,
लम्हे आखिर छोटे है, मासूम बहोत है, लड़ते है,
वक़्त बड़ा है, उम्रदराज़ है हर मसले का हल ही है।

कल रात कुछ लम्हो की कहा सुनी हुई है शायद,
सहर के लम्हो के माथे पर हैरानी के घाव लगे थे।

Tuesday, 28 March 2017

सड़क

शाम से सहर तक जो एक
लंबी सड़क जाती है,
कुछ दूरी पर रात के घने जंगलों से,
होकर गुज़रना पड़ता है,
सुनसान, खामोश, अँधेरा,
मिलो लंबा सफर,
पुरानी यादो के कई,
घने दरख्तों से होकर
जाती है ये सड़क,
न कोई पक्का रास्ता,
न कोई अंदाज़ा की किस और निकले,
तसव्वुर के सूखे पत्तों की,
सरसराहट गूंजती है चार सु,
कुछ नज़्में, किसी पंछी की तरह,
कानो के पास से यकायक
आवाज़ करते हुए निकल जाती है,
खयालो के कितने ही,
रेंगते जानवर है इस जंगल में,
इस जंगल में, जाने कबसे,
यक़ीनन कुछ ज़हरीले भी है,
हो सकता काट भी ले,
ख्वाबो के कुछ धीमे उजाले,
चाँद सितारों जैसे ही कुछ,
कही कही पे दीखते है,
धुन्दले है पर, साफ़ नहीं है।
आधे सफर में यु ही अचानक,
एक सौंधी सी खुशबु आती है,
तेरा तसव्वुर, हा तेरा तसव्वुर,
उसी पुराने पौधे पे फिर,
खीला है आधा, महक रहा है,
अब ये जंगल, सुनसान, खामोश, अँधेरा,
खुशनुमा लगता है,
अब सारे तसव्वुर खामोश पड़े है,
ज़हरीले सब खयाल आब ओ हयात है अब,
वो नज़्म जो तब गुज़री थी आवाज़ में लिपटी,
अब कांधे पे आ बैठी है,
कानो में घुलती जाती है,
सहर को जाऊ, या ना जाऊ,
मुकाम करू, यही रात बिताऊँ,
कश्मकश में अब फिरसे हु,
एक नज़्म ने फिरसे रोक लिया है,
उसी सड़क पे,

शाम से सहर तक जो एक
लंबी सड़क जाती है।

Friday, 10 March 2017

वो जो एक बात

वो जो एक बात, आधी अधूरी बुनी हुयी,
तुम मेज़ पर छोड़कर चली गयी थी,
उसे से रोज़ाना एक धागा निकालता हु मै,
रोज़ाना एक नया मतलब बनाता हूँ,
जो धागा निकाल देता हूं बात से,
फिर पिरो नहीं पाता दोबारा उसमे,
कई सौ मतलब यु ही बिखरे पड़े है,
धागों की सूरत कमरे में,
वो बात उधड़ गयी है एक सीरे से,
मतलबो से रेशा रेशा हो गई है,
कई और महीन और पेचीदा धागे है उसमें,
कई हज़ार मतलब और भी निकलेंगे,
यु ही उधेड़ता रहूँगा मैं, रोज़ाना,
जाने किस धागे में वो मतलब मिल जाए,
पर फिर सोचता हूं, तुम्हारी बात थी,
और उसे मैं उधेडु, खुदगर्ज़ी होगी,
वैसे मैं भी जान ही गया हूं अब,
मतलब धागों में रखा ही कहा था कोई,
मतलब तो बुनने में था, जो तुम्ही जानती हो।
अब आ भी जाओ, बुन दो, वो बात पूरी करदो।

वो जो एक बात, आधी अधूरी बुनी हुयी,
तुम मेज़ पर छोड़कर चली गयी थी,

Sunday, 3 July 2016

जब तुम

जब तुम मेरी बाहों का तकिया बनाकर सोती हो,
मै देर तक ताकता रहता हु तुम्हे,
कोई तासुर नहीं होता तुम्हारे चेहरे पर,
न ही कोई शिकन होती है माथे पर,
एक बेफिक्री फैली हुई होती है माथे से लबो तक,
एक मासूमियत की गुलाबी परत आ जाती है चेहरे पे,
बड़ा दिल करता है की समेट लू हाथो से उसे,
और अपनी हथेली पे मल लू,
जब भी तुम उदास लगो या परेशां रहो,
तुम्हारे चेहरे पे लगा दू ये रंग ओ अदा,
तुम्हे ताज्जुब होगा पर हकीकत है ये भी,
की उस वक़्त मेरे भी चेहरे पे कोई तासुर नहीं होते,
जो सुकूं तुम्हे मिलता है बंद आँखों में उस वक़्त,
उसी सुकूं को मै भी जीता हु खुली आँखों से.

मै सोता हु तुम्हारी आँखों से,
तुम मेरी आँखों से जागती हो।

Sunday, 17 January 2016

नज़्म

मुझमे कोई मरा है कल शब्,
जिस्म से रूह तक मातम है,
बड़ा करीबी किरदार था मेरा,
वक़्त बेवक्त काम आया था,
वो मुझसे था की मै उससे,
अब पता चलेगा उसके जाने के बाद,
कई हबीब औ रकीब मेरे,
बस उसीको जानते थे,
मै महज़ एक पहनावा था,
ताकि जुड़ने में आसानी हो,
अब डरता हु खाली सुखा जिस्म लिए,
अब कैसे अपनी पहचान कहु,
उसका अपना जिस्म भी नहीं था,
फिर भी एक खालीपन है,
शक्ल औ सूरत होकर भी,
कोई भी पहचान नहीं है,
अब कोई कैसे दफ़्न करे,
और मज़ार पे क्या लिखे,
कौन मरा, कब पैदा हुआ था?
ये भी क्या रवाज़ ए दुनिया,
बस जिस्मो का जशन औ मातम,
हालाकी सब जुड़े हुए है,
एक दूजे के किरदारों से,

मुझमे एक किरदार मरा है,
यतीम जिस्म अभी ज़िंदा है।

Tuesday, 14 July 2015

Thursday, 24 April 2014

Ek Nazm

दफ्तर से लौटकर जब घर क दरवाजा खोलता हु,
तन्हाई दौड़कर लिपट जाती है मुझसे
ख़ामोशी दिनभर कि सारी बाते दोहराती है
खिड़किया खोलता हु तो हवा बालोँ को सहलाती है
फिर आईने मे खुदको देखता हु, सुकून मिलता है
की इस घर मे एक और चेहरा अब भी रहता है
बिस्तर कि सिलवटे सुबह से शाम तक वैसी हि पडी रहतीं है,
सुस्त, थकी हुई
तुम्हारे जाने के बाद इन सब ने हि तो संभाला है मुझे,
पर अब डर सा लगता है
की कोई फिरसे आकर इन्हे निकाल न दे घर से,
आदत सी हो गयी है अब इनकी, उतनी हि जितनी कभी तुम्हारी थी
अब मै नहीं चाहता की दरवाजा खुलने पे
कोई और आकर लिपट जाये मुझसे,
अब किसी और से दिन कि सारी बाते नहीं बाट पाउ शायद
ये तन्हाई तुमने दिया हुए आख़री तौफा है मेरे पास,
इसे भी खो दिया तो क्या बचेगा फ़िर मेरे पास.

किसी और के होने से भी बेहतर है तेरा ना होना।

Monday, 10 October 2011

एक नज़्म.....

कल यु ही बिखरे कमरे को समटते हुए,
कुछ पुरजे मिले काफी पुराने, काफी खस्ता,
कुछ हर्फ़ दिखे धुन्दले धुन्दले, हा तुमसे ही बाबस्ता,
आंसुओ की बूंदों के कुछ ताज़ा तरीन निशाँ भी थे,
उंगली से जब चखकर देखा,
गम का जायका वही था अब भी, नमकीन बहोत,
कागज़ भी कमज़ोर हो चूका था,
हर्फो के बोझ से बेजार बहोत,
तुम्हारी खुशबु आ रही थी हल्की हल्की,
पर तुमने छुआ नहीं था उस पुर्जे को कभी,
शायद उसी दिन तुम मुझसे आखरी दफा मिली थी,
शायद इस पुरजे में लपेटकर रखा था मैंने उस विसाल-इ-शब् को,
तारीख मिट चुकी होगी या शायद लिखी ही न हो,
पर धुल हटाकर देखू तो वो दिन साफ़ नज़र आता है अब भी,
स्याही से लिखे हर्फ़ वक़्त के साथ धुन्दले हो गए है सभी तक़रीबन,
सूखे हुए आसुओ के निशाँ लेकिन अब भी वैसे ही है ताज़ा, नमकीन.
काश वो आखरी नज़्म मैंने स्याही से न लिखी होती....

कल यु ही बिखरे कमरे को समटते हुए,
कुछ पुरजे मिले काफी पुराने, काफी खस्ता,
कुछ हर्फ़ दिखे धुन्दले धुन्दले, हा तुमसे ही बाबस्ता.

Monday, 12 September 2011

एक नज़्म: जिसने कल रात सोने नहीं दिया

चलो अब ये तकल्लुफ भी छोड़ दो,
मुझे देखकर शर्मिंदगी से मुस्कुराना,
एक सवाल 'कैसे हो' पूछकर,
जवाब में ' मै भी ठीक ही हु' बताना.

मुझको इल्म है सच कहोगी,
तो बहोत दर्द होगा मुझको,
पर क्या तुम्हारे तासुरो की जुबां नहीं जनता हु मै?
क्या तुम्हारे आँखों की चमक को नहीं महसूस कर सकता हु अब?
तुमको याद होगा, तुम्हारे आँखों की सुजन देखकर अश्को का हिसाब किया है कई दफा मैंने.
क्या तुम्हारे प्यार की शिद्दत को भूल चूका हु, की बस बातो को मान लूँगा?
मैंने तुम्हारे दर्द को तुम्हारी ख़ामोशी में महसूस किया है हमेशा.
तुम्हारी सिसकियो को पढ़ा है मैंने, सिर्फ उन्हें सुनकर तुम्हारे गम का अंदाजा लगाया है.
तुम्हारे होठो की कपकपाहट देखकर बता सकता हु तुम सच बोल रही हो या ...
मुझे तुम्हारे लफ्जो को समझना नहीं आता.
हमारे इश्क की जुबां में 'लफ्ज' कभी थे ही नहीं.
मैंने आज भी बस तुम्हारे तासुर पढ़े, नज़रे महसूस की,
तुम्हारे लफ्जो की दलीले झूटी थी न आज?
आज तुम क्यों खामोश नहीं थी " सबा "?
पर उस रिश्ते के लिए झूट भी क्यों बोले अब,
बेसबब उसकी मौत को क्यों मुश्किल करे.
मौत की तारीख तो मुकम्मल है उसकी.
बस इंतजार करो, और अगर याद रहे तो,
'उस' रोज़ कुछ आंसू बहा देना.

चलो अब ये तकल्लुफ भी छोड़ दो,
मुझे देखकर शर्मिंदगी से मुस्कुराना,
एक सवाल 'कैसे हो' पूछकर,
जवाब में ' मै भी ठीक हु' बताना.

Tuesday, 16 August 2011

कुछ ख्वाबो की लाशे पड़ी है

आँखों की सरहद पर कुछ ख्वाबो की लाशे पड़ी है,
धुन्दला धुन्दला मंजर है और अश्को की भीड़ बड़ी है.
गौर से देखा लाशो को उनकी, अभी अभी के है सारे,
कितने मासूम है बच्चो से, हैरत है किसने मरे.
इस अजाब का गहरा असर है, पुरे चेहरे पे मातम है,
तनाव काफी है तसुरो में, और धड़कन कुछ मद्धम .
पलकों की बाहों में रखे है, कल तक आँखों का नूर थे वो,
ऐसा क्या था सोच रहा हु, की मरने को मजबूर थे वो?
मैंने सुना है, एक उम्मीदों की डोर थी दिल के कोने में,
उसके सहारे कई ख्वाब थे बेचैन, हकीकत होने में.
आँखों तक तो पहोच चुके थे, उस डोर को 'तुमने' तोड़ दिया,
अश्को को सैलाब भला क्यों, आँखों की तरफ ही मोड़ दिया.
बड़ी मशक्कत की लेकिन, बस मौत ही था अंजाम 'शफक'.
जिन आँखों में मौत हुई है, होगा उसपर ही इल्जाम 'शफक'.

आँखों की सरहद पर कुछ ख्वाबो की लाशे पड़ी है,
धुन्दला धुन्दला मंजर है और अश्को की भीड़ बड़ी है.

Monday, 9 May 2011


कल रात दफ़न कर आया हु


कल रात दफ़न कर आया हु,
वो ख्वाब जो कल शाम मरे.

अश्को से नहलाया पहले,
आहो से फिर पोछा भी,
तेरी यादो का अत्तर छींटा,
पलकों के सहारे बैठाया फिर,
सारी खोकली बाते रखदी,
सारे झूटे वादे परोसे,
जो बहोत पसंद थे ख्वाबो को,
फटी पुराणी, काफी खस्ता,
रिश्ते की फिर चादर ली,
सारे टुकडे जोड़े फिरसे
दिल की तसल्ली की खातिर,
और कफ़न में रखे सारे,
अश्को के कुछ फुल बिछाए.
बड़ी हिफाजत से ढंका फिर,
उस मासूम से चेहरे को,
अब तक पलकों की शान थे सारे,
अब कांधे पे बोझ ही थे,

कल रात दफ़न कर आया हु,
वो ख्वाब जो कल शाम मरे.

Friday, 15 April 2011

बोझल आँखे

बोझल आँखे, बिखरी जुल्फे,
कुछ सुस्त लकीरे माथे पे,
कुछ थका हुआ चेहरा फिर भी,
हलकी सी तबस्सुम होठो पे

इल्म नहीं अब कहा हो तुम,
कैसी हो और किस जहाँ हो तुम,
पर अब भी हर शब् मेरी ही,
बाहों में आकर सोती हो,
कुछ देर लिपटकर रोती हो,
मेरे चेहरे को तकती हो,
फिर आँखों पे बोसा रखती हो.

अक्सर लोग बिछड़ जाते है,
अपनी राह को बढ़ जाते है,
इश्क कभी पर मरता नहीं,
वो जिंदा रहता है यु ही,
कभी गज़लों में, कभी बातो में,
कुछ यादो में, जज्बातो में,
उन बेमौसम बरसातो में,
और कुछ ऐसी रातो में.

Thursday, 3 February 2011

गज़ल

मेज पर रखी हुई एक अधमरी गज़ल के,
लफ्जो ने, जैसे एक दुसरे को पकड़ कर रखा था,
की कही हाथ छुट गए तो बिखर जायेंगे,
फिर कागज़ पे छिंटो के तरह बिखरे लफ्जो
के मायने ढूंडने पर भी शायद न मिले.

ऐसे ही कभी शिद्दत से पकड़ा था ना हाथ तुमने,
बड़ी जल्दी हाथ छुड़ाकर चली गयी तुम,
बिखरा पड़ा हु मै, अपनी ही ज़िंदगी में,
रोजाना कोशिश करता हु, ढूंडता हु ,
कोई मायना नज़र नहीं आता जीने का.
एक आखरी वफ़ा करदो मुझसे,
इन सारे लफ्जो को समेट्लो,
और दफनादो उसी आगाज पे,
जहा इन लफ्जोने एक दुसरे का हाथ थामा था.

Wednesday, 5 January 2011


एक खरोच आई थी


एक खरोच आई थी उस रिश्ते के सीने पे,
कई दिनों तक कुरेदते रहे वो दोनों,
उसका इलाज भी नहीं किया किसीने,
यु तो कहने को वो रिश्ता उनकी औलाद से कम न था,
पता नहीं ऐसा क्या हुआ की उसकी जख्म को अनदेखा किया,
बड़ी बेरुखी से पेश आते थे वो दोनों उससे,
उसकी चीखता, चिल्लाता, रोता रहता रात रातभर
कोई नहीं था पर चुप करने को, समझाने को.
उसका जख्म धीरे धीरे तासुर बन गया,
तकलीफ उस हद तक पहुच गयी की उसने अपनी साँसे रोक ली,
सुना है कल रात मौत हो गयी उस रिश्ते की,
बहोत देर तक रोते रहे वो दोनों, बहोत कोशिश की उसे जगाने की,
बहोत मनाया उसे, बहोत सहलाया उसके जख्म को,
दवा, दुआ दोनों बेअसर थी मगर,
वो रिश्ता नहीं जागा उस नींद से,
दम तोड़ दिया था उसने, आँखे बंद कर ली थी,
कोई वजह नहीं थी उसके पास शायद जीने की.
अब वो दोनों के पास कुछ भी नहीं बचा है.
अब वो दोनों अकेले रहते है,
जिन्दा है अब भी पर जी नहीं पाते.
वो रिश्ता एक जिंदगी था, जिसे वो दोनों जिते थे.
अब उस रिश्ते की कुछ तस्वीरे है दोनों के पास,
कुछ यादे है, कुछ किस्से है.
साँसों का बोझ बहोत भारी होता है,
पता नहीं कितने दिनों तक ढो पाएंगे अकेले.

एक खरोच आई थी उस रिश्ते के सीने पे.

Monday, 25 October 2010

मायने


तुम्हारे न लौटकर आने के फैसले ने,
मेरी ज़िंदगी के मायने बदल दीये.


अब किसी का इंतजार नहीं रहता,
किसीके आने और जाने से फर्क नहीं पड़ता अब,
बहोत भीड़ में भी बहोत अकेला होता हु मै.
आँखे भी किसी चेहरे को तलाशती नहीं अब,
अब मै अपना हर काम अपने वक़्त पे करता हु,
आजकल चाँद भी बस चाँद है,
उस एक दाग के अलावा कुछ भी नहीं बचा उसके पास,
कमरे में कुछ ख्याल रहते है सुस्त, थके हारे,
और कुछ अधमरी गज़ले डायरी के कफ़न में लिपटी हुई,
पड़ी रहती है मेज पर,
न ही कोई पढ़ता है और न ही कोई समझ पाया अब तक,
अब मै भी गौर नहीं करता उनपर,
क्या होगा हर्फ़ हर्फ़ बनी थी, हर्फ़ हर्फ़ बिखर जाएँगी.
बस एक चीज़ नहीं बदली तुम्हारे जाने के बाद,
तुम्हारी यादे आज भी आती है रोजाना,
कुछ देर बैठती है साथ, पुरानी बाते करती है,
कुछ गुज़ारे हुए हसीं मंज़र ताज़ा करती है,
और कुछ रुला देती है मुझको.
कुछ ऐसे गुजरते है दिन,
मेरे कमरे का आइना भी नहीं पहचानता अब मुझको,
उम्मीदों ने धीरे धीरे दम तोड़ दिया है,
अब कोई वजह नहीं दिखती जिंदा रहने की,

तुम्हारे न लौटकर आने के फैसले ने,
मेरी ज़िंदगी के मायने बदल दीये.

Tuesday, 5 October 2010

शायद...

एक चेहरा रहेगा धुन्दला सा, यादो पे धुल जमी होगी,
सब कुछ तो रहेगा दामन में, बस एक चीज़ की बहोत कमी होगी.


कुछ तारीखों पे शायद दिल कुछ देर के खातिर भर आये,
किसी शाम अचानक तन्हाई में बीते कल पे पछताए.
कभी नाम सुनो तो शायद दिल की धड़कन बढ़ जाएगी,
कभी रात अँधेरे यादे मेरी तुमसे देर तलक लड़ जाएगी,
कभी यु ही अचानक मेरी लिखी गझलो को सहलाओगी,
फिर चाँद को देखोगी जी भरके और खुदको बहलाओगी.
हर बात पे मेरी बात तुम्हे तो याद यक़ीनन आएगी,
कभी तुमको रुला रुला देगी, कभी तुमको कुछ समझाएगी.
मेरे अशआर सारी बीती बाते जिन्दा कर देंगे,
उन शामो को दोहराएंगे, वो राते जिंदा कर देंगे.
तुम कोशिश करना फिर भी मुझको भूल ही जाने की,
मेरी यादे, बाते मेरी और उस रब्त को दफनाने की.
किसी ख्वाब के माफिक धीरे धीरे मै धुन्दला हो जाऊंगा,
मसरूफ रहोगी तुम औरो में और मै यादो से भी खो जाऊंगा.
फिर शायद वो तारीखे भी तुम्हारे जहन से उतर जाये,
मेरा वजूद, मेरे अल्फाज़ कागज़ से गिरकर बिखर जाए,
शायद वो चाँद भी तुमको मेरी यादो तक न ला पाए,
न मेरी गज़ले तुमको गोद में अपनी सुला पाए.
तब कुछ वक़्त अकेले कमरे में, मेरी गज़लों की सोबत में,
दो चार कतरे आंसू के अपनी आंखोसे बहा देना,
हो पाए अगर मुमकीन तुमसे पुरे दिल से एक दुआ देना.
अब मेरी साँसे रुक जाये, दिल की आवाज़ भी थम जाये,
तेरी तस्वीर को तकता रहू, और बस उस पल ही दम जाए....

Tuesday, 12 May 2009

Ye Aasman Bhi Kabhi Kabhi...

Ye aasman bhi kabhi kabhi rakeebo sa lagata hai,
Sara din suraj se jalaata hai aur shab me chand se,
Tare to jaise hifajat ke liye hai chand ke,
Chand ko jara mohabbat se dekho to tut padenge.
Kambakht thik se didar bhi nahi karne deta,
badlo ka naqab chadha deta hai massom si shakal par.
Raat ke andhere me dur tak kuchh nahi hota,
sirf falak ke mathe pe ek gol bindi, balo me kuchh sitare.
Sochta hu agar ek chand aur ek suraj mere jamin ke bhi hote,
iska matha bhi sunaa nahi hota,
Sahar hoti to ek suraj ka diya yaha pe bhi jalta,
Iski bhi julfe lahrati to sitare jagmaga uthate.
Khuda bhi bada chalak hai,
Ishq muze diya aur chand apne mathe pe saja liya,
Roshni muzko de di aur aaftab khud rakh liya.
Andhero se jaked kar rakha muzko aur taro ki fauj aasman par.

Ye aasman bhi kabhi kabhi rakeebo sa lagata hai.

Wednesday, 1 April 2009

Kanupriya !!

यह जो मैं गृहकाज से अलसा कर अक्सर
इधर चली आती हूँ
और कदम्ब की छाँह में शिथिल, अस्तव्यस्त
अनमनी-सी पड़ी रहती हूँ....



यह पछतावा अब मुझे हर क्षण
सालता रहता है कि
मैं उस रास की रात तुम्हारे पास से लौट क्यों आयी ?
जो चरण तुम्हारे वेणुवादन की लय पर
तुम्हारे नील जलज तन की परिक्रमा दे कर नाचते रहे
वे फिर घर की ओर उठ कैसे पाये
मैं उस दिन लौटी क्यों-
कण-कण अपने को तुम्हें दे कर रीत क्यों नहीं गयी ?
तुम ने तो उस रास की रात
जिसे अंशत: भी आत्मसात् किया
उसे सम्पूर्ण बना कर
वापस अपने-अपने घर भेज दिया


पर हाय वही सम्पूर्णता तो
इस जिस्म के एक-एक कण में
बराबर टीसती रहती है,
तुम्हारे लिए !



कैसे हो जी तुम ?
जब मैं जाना ही नहीं चाहती
तो बाँसुरी के एक गहरे अलाप से
मदोन्मत्त मुझे खींच बुलाते हो



और जब वापस नहीं आना चाहती
तब मुझे अंशत: ग्रहण कर
सम्पूर्ण बना कर लौटा देते हो !


By Dharmveer Bharati