Monday, 11 April 2011

कुछ अधूरी गज़ले...


मेरे आनेसे शकल उनकी, यु सवर आई है,
जैसे एक नज़्म जहन से रुख पे उतर आई है.


तेरे चेहरे को फकत हाथोसे छुआ था मैंने,
उम्र की धुंदली लकीर, फिरसे उभर आई है.
जैसे एक नज़्म जहन से रुख पे उतर आई है.

तेरी सोबत है, तो आबाद है गुलशन सारे,
या मेरी बेजान सी आँखों को नज़र आई है.
जैसे एक नज़्म जहन से रुख पे उतर आई है.

----------------------------------------------------------------

लफ्जो में कड़वाहट भी, रंग अहसासों के फीके है,
मेरी गज़ले न लबो पे लो, सारे मिसरे अब तीखे है.


खामोश है सारे लफ्ज मगर, कागज़ में आवाज़ भी है,
पुरजो में फितरत है मेरी, लफ्जो में तेरे सालीखे है.
मेरी गज़ले न लबो पे लो, सारे मिसरे अब तीखे है.