उधेड़ने लगा है...
कौन है जो जख्म पुराने उधेड़ने लगा है,
तेरे लहजे में मेरी गज़ले पढ़ने लगा है,
कीस सहरा में निचोड़ आउ ये अश्क-ए-समंदर,
बोझ पलको का बहोत ज्यादा बढ़ने लगा है.
कौन है जो जख्म पुराने उधेड़ने लगा है,
सुबह सुकून से गुजारी तेरे आँचल में माँ,
सूरज ज़िन्दगी का अब मगर चढ़ने लगा है.
कौन है जो जख्म पुराने उधेड़ने लगा है.
भर गया दिल खिलोने से शायद बच्चे का,
पहले खिलखिलाता था, अब उखड़ने लगा है.
कौन है जो जख्म पुराने उधेड़ने लगा है.